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गुडगाँव में सर्वाइकल कैंसर का इलाज

आज बदलती जीवनशैली, देर से विवाह, बार-बार गर्भधारण और ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (HPV) संक्रमण जैसी वजहों से मेट्रो शहरों, खासकर गुडगाँव में सर्वाइकल कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है। अगर आपको अनियमित पीरियड्स, सेक्स के बाद ब्लीडिंग, थकान, वजन कम होना या पेट के निचले हिस्से में दर्द जैसे लक्षण महसूस हो रहे हैं, तो यह सावधान होने का संकेत हो सकते हैं। ऐसे में तुरंत विशेषज्ञ से परामर्श लेना बहुत ज़रूरी है। अगर आप गुडगाँव में सर्वाइकल कैंसर के बेस्ट डॉक्टर से परामर्श करना चाहती हैं तो बिरला फर्टिलिटी एंड आईवीएफ से सम्पर्क करें। हमारे अनुभवी गाइनको-ऑन्कोलॉजिस्ट पैप स्मीयर, कोलपॉस्कोपी, बायोप्सी और HPV टेस्ट जैसी जांच कराते हैं ताकि बीमारी का सही समय पर पता चल सके और प्रभावी इलाज हो सके। सही जांच और व्यक्तिगत इलाज से सर्वाइकल कैंसर को रोका और सफलतापूर्वक ठीक किया जा सकता है। आज ही अपना अपॉइंटमेंट बुक करें।

गुडगाँव में सर्वाइकल कैंसर के इलाज की प्रक्रिया

शुरुआती परामर्श में आपके लक्षणों और मेडिकल हिस्ट्री को समझा जाता है। उसके बाद, कुछ जाँचों का सुझाव दिया जाता है जिससे इलाज की दिशा तय होती है।

सर्वाइकल कैंसर क्या है?

सर्वाइकल कैंसर महिलाओं के गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स) में होने वाला कैंसर है। सर्विक्स गर्भाशय का वह निचला हिस्सा है, जो योनि से जुड़ा होता है। यह कैंसर तब होता है जब सर्विक्स की कोशिकाएं असामान्य तरीके से बढ़ने लगती हैं और आस-पास के ऊतकों या अंगों में फैल सकती हैं।

सर्वाइकल कैंसर धीरे-धीरे विकसित होता है और शुरुआत में इसके लक्षण बहुत हल्के या न के बराबर होते हैं, इसलिए नियमित जांच बहुत ज़रूरी है। अच्छी बात यह है कि यह कैंसर शुरुआती अवस्था में पकड़ में आ जाए तो इसका इलाज संभव है।

सर्वाइकल कैंसर के स्टेज

सर्वाइकल कैंसर को चार मुख्य स्टेज में बांटा जाता है:

 

  • स्टेज 0: इसे सर्विकल इंट्राऑपिथीलियल नियोप्लासिया कहा जाता है। इसमें कोशिकाएं कैंसरस बनने की ओर होती हैं लेकिन पूरी तरह कैंसर नहीं बनतीं।
  • स्टेज 1: कैंसर सिर्फ सर्विक्स तक ही सीमित रहता है।
  • स्टेज 2: कैंसर सर्विक्स से बाहर फैलने लगता है लेकिन पेल्विक वॉल या निचली योनि तक नहीं पहुंचता।
  • स्टेज 3: कैंसर पेल्विक वॉल, निचली योनि या किडनी तक फैल सकता है।
  • स्टेज 4: यह सबसे गंभीर स्टेज होती है। इसमें कैंसर मूत्राशय, मलाशय या शरीर के अन्य हिस्सों में फैल जाता है।

सर्वाइकल कैंसर के लिए वैक्सीन

सर्वाइकल कैंसर से बचने के लिए HPV वैक्सीन (ह्यूमन पैपिलोमा वायरस वैक्सीन) सबसे कारगर उपाय है। यह वैक्सीन उन वायरस स्ट्रेन्स से सुरक्षा देती है जो इस कैंसर का प्रमुख कारण हैं।

 

HPV वैक्सीन से जुड़ी बातें:

 

  • 9 से 14 साल की उम्र में वैक्सीन देना सबसे असरदार होता है।
  • 15 से 26 साल तक की लड़कियां और महिलाएं भी इसे ले सकती हैं।
  • यह वैक्सीन पुरुषों को भी दी जा सकती है, जिससे HPV का फैलाव रोका जा सके।

सर्वाइकल कैंसर के कारण

इस कैंसर का सबसे बड़ा कारण HPV (Human Papillomavirus) संक्रमण है। इसके अलावा अन्य कारण भी होते हैं जैसे कि:

 

  • असुरक्षित यौन संबंध
  • एक से अधिक यौन साथी होना
  • कमजोर इम्यून सिस्टम
  • स्मोकिंग (धूम्रपान)
  • लंबी अवधि तक बर्थ कंट्रोल पिल्स का सेवन
  • समय-समय पर पैप स्मीयर टेस्ट न कराना

सर्वाइकल कैंसर के लक्षण

शुरुआती चरण में इसके कोई खास लक्षण नहीं होते, लेकिन जैसे-जैसे यह बढ़ता है, निम्नलिखित लक्षण नजर आ सकते हैं:

 

अगर इन लक्षणों में से कोई भी लगातार महसूस हो रहा हो तो डॉक्टर से तुरंत जांच करवाना ज़रूरी है।

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सर्वाइकल कैंसर की जाँच

इस कैंसर की शुरुआती पहचान के लिए दो मुख्य जांचें होती हैं:

 

  1. पैप स्मीयर टेस्ट: इसमें सर्विक्स से कोशिकाएं लेकर जांच की जाती है कि कोई असामान्य बदलाव तो नहीं है।
  2. HPV टेस्ट: इससे यह पता चलता है कि व्यक्ति के शरीर में ह्यूमन पैपिलोमा वायरस मौजूद है या नहीं।

अन्य जांचें जैसे कोलपोस्कोपी, बायोप्सी, MRI या CT स्कैन भी ज़रूरत पड़ने पर की जा सकती हैं।

सर्वाइकल कैंसर का इलाज

इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि कैंसर किस स्टेज में है। मुख्य इलाज विकल्प हैं:

 

  1. सर्जरी: अगर कैंसर शुरुआती स्टेज में है तो सर्विक्स या गर्भाशय को सर्जरी से हटाया जा सकता है।
  2. रेडिएशन थेरेपी: इसमें उच्च ऊर्जा किरणों से कैंसर कोशिकाओं को नष्ट किया जाता है।
  3. कीमोथेरेपी: दवाओं से कैंसर कोशिकाएं मारी जाती हैं। अक्सर रेडिएशन के साथ दी जाती है।
  4. टार्गेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी: कुछ खास मामलों में नई तकनीकों से ट्रीटमेंट किया जाता है।

जल्दी इलाज शुरू होने पर सफलता की संभावना बहुत ज्यादा होती है।

सर्वाइकल कैंसर के जोखिम कारक

कुछ महिलाएं इस कैंसर के ज्यादा खतरे में होती हैं। प्रमुख जोखिम कारक हैं:

 

  • 30 साल की उम्र के बाद HPV संक्रमण होना
  • समय-समय पर पैप टेस्ट न करवाना
  • स्मोकिंग करना
  • HIV या इम्यून सिस्टम से जुड़ी बीमारियां
  • बहुत कम उम्र में यौन संबंध शुरू करना
  • एक से अधिक यौन साथी होना
  • पोषण की कमी और कमजोर इम्यूनिटी

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