
प्रेगनेंसी का छठा महीना – लक्षण, विकास, डाइट और सावधानियां

प्रेगनेंसी का छठा महीना कई मायनों में बेहद अहम होता है। इस समय तक आप प्रेगनेंसी का आधा सफ़र पार कर चुकी होती हैं और आपके शिशु का विकास कई स्तर पर साफ़ दिखने लगता है। शिशु का विकास अब उस दिशा में बढ़ना शुरू होता है, जब वह गर्भ के बाहर जीवन जीने के लिए तैयार हो सके। यह महीना प्रेगनेंसी की दूसरी तिमाही का आख़िरी महीना होता है, जिसे आम तौर पर गोल्डन मंथ कहा जाता है, क्योंकि पहली तिमाही की तुलना में इस दौरान असुविधा कम होती है।
इस लेख में हम छठे महीने के दौरान शिशु के विकास, आपके शरीर में होने वाले बदलाव, स्वास्थ्य से जुड़े सुझाव के अलावा जानेंगे कि किन हालात में आपको डॉक्टर से मिलना चाहिए और क्या-क्या खाना चाहिए।
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छठे महीने में इन बदलावों के लिए ख़ुद को तैयार रखें
इस दौरान आपकी प्रेगनेंसी के 20 सप्ताह पूरे हो चुके होते हैं और आप पूरी तरह एक प्रेगनेंट महिला के रूप में दिखने लगती हैं, क्योंकि आपके बेबी बंप का साइज़ काफ़ी बड़ा हो जाता है। जैसे-जैसे आपके शिशु को पौष्टिक आहार की ज़रूरत बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे आपके शरीर में ख़ून का उत्पादन बढ़ने लगता है। छठे महीने में आपको कई सामान्य लक्षण देखने को मिल सकते हैं, लेकिन इनको लेकर घबराने की ज़रूरत नहीं है। आइए इन बदलावों को समझते हैं।
शारीरिक बदलाव
- वजन बढ़ना: अब तक, आपका वज़न लगभग 4–6 किलोग्राम बढ़ चुका होगा। यह वज़न शिशु के विकास और डिलीवरी के साथ-साथ स्तनपान के लिए आपके शरीर को तैयार करने के लिए ज़रूरी है।
- पेट का आकार बढ़ना: जैसे-जैसे गर्भाशय का आकार बढ़ता है, आपके डायाफ़्रैम पर उसी हिसाब से दबाव भी बढ़ता जाता है। इस वजह से आपको सांस लेने में कठिनाई हो सकती है। आपकी नाभि बाहर की ओर निकली हुई दिखने लगती है। ये सब बेहद सामान्य और प्राकृतिक है।
- स्ट्रेच मार्क्स: आपके पेट, जांघों और स्तनों की त्वचा खिंचने लगती है, जिससे आपके शरीर के इन हिस्सों पर स्ट्रेच मार्क्स हो सकते हैं। इसके लिए ज़रूरी है कि आप अपने त्वचा को मॉइस्चराज़ करके रखें।
- ब्रैक्सटन हिक्स कंट्रैक्शन: डिलीवरी से पहले मां का शरीर ख़ुद को इसके लिए तैयार करता है। इसलिए, गर्भाशय यानी यूट्रस में खिंचाव महसूस होता है। कई बार इस खिंचाव को लोग लेबर पेन समझ बैठते हैं, लेकिन यह दर्द उतना तेज़ नहीं होता।
भावनात्मक बदलाव
हार्मोन में होने वाले उतार-चढ़ाव की वजह से मूड स्विंग, चिड़चिड़ापन या चिंता हो सकती है। प्राणायाम, ध्यान से जुड़ा कोई योग या फिर प्रीनेटल योग से आपको भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
प्रेगनेंसी के छठे महीने में होने वाले सामान्य लक्षण
| लक्षण | कारण | सुझाव |
| सीने में जलन और अपच | बढ़ते गर्भाशय की वजह से पेट पर बढ़ता दबाव | कम मात्रा में ज़्यादा बार भोजन करें, मसालेदार खाना खाने से परहेज करें |
| पैरों और टखनों में सूजन | ख़ून की बढ़ी हुई मात्रा और फ़्लुइड रिटेंशन | पैर को ऊंचा करके रखें और पर्याप्त पानी पीते रहें |
| कमर दर्द | बढ़ते पेट की वजह से शरीर के पोश्चर में बदलाव | सपोर्टिव चेयर का इस्तेमाल करें और स्ट्रेचिंग करें |
| पैरों में ऐंठन | कैल्शियम या मैग्नीशियम की कमी | चलते-फिरते रहें और आहार में डेयरी उत्पाद शामिल करें |
| वैरिकोज़ वीन | नसों पर दबाव और बढ़े हुए रक्त प्रवाह के कारण | ज़रूरत पड़ने पर दर्द से राहत देने वाले मोजे पहनें |
छठे महीने में शिशु का विकास
छठे महीने तक, आपका शिशु लगभग 12–14 इंच लंबा और उसका वज़न 600 से 900 ग्राम वज़न का हो जाता है। आइए शिशु के विकास पर एक नज़र डालते हैं:
सेंसरी यानी ज्ञानेंद्रियों का विकास
- आंखें: इससे पहले तक शिशु की बंद रहीं पलकें अब खुलना शुरू कर देती हैं। रेटिना बनने लगती है और शिशु आपके पेट से छनकर आने वाली रोशनी पर प्रतिक्रिया जताना शुरू कर देता है।
- कान: शिशु की सुनने की क्षमता में काफ़ी सुधार होता है। वह आपकी आवाज़ पहचान सकता है और संगीत या तेज़ शोर जैसी बाहरी आवाज़ों पर प्रतिक्रिया दे सकता है।
- स्पर्श और स्वाद: शिशु को स्पर्श का अनुभव होने लगता है और अमूमन वे अपने चेहरे को छूने या अंगूठा चूसने जैसी गतिविधियां शुरू कर देते हैं। टेस्ट बड भी बनने लगता है यानी शिशु को स्वाद का शुरुआती अंदाज़ा लगने लगता है। इस दौरान वे एम्नियोटिक फ़्लूइड के स्वाद को पहचान सकते हैं।
त्वचा और फ़ैट का लेयर
शिशु की त्वचा पतली और पारदर्शी होती है, लेकिन इसे एक सफ़ेद क्रीमी परत घेरे रहती है, जिसे वर्निक्स केसियोसा कहते हैं। यह शिशु को एम्नियोटिक फ़्लूइड में सूखने से बचाती है। शिशु के भीतर और भी तरह के फ़ैट बनने लगते हैं, जैसे कि सबक्यूटेनियस फ़ैट। यह उसे इन्सुलेशन और एनर्जी स्टोर करने में मदद करता है।
अंदरूनी अंग
- मस्तिष्क: मस्तिष्क तेज़ी से बढ़ने लगता है और इस तरह ज़रूरी न्यूरल कनेक्शन की नींव बनने लगती है।
- फेफड़े: हालांकि, फेफड़े इस समय तक पूरी तरह मैच्योर नहीं होते, लेकिन फेफड़ों में अल्वियोली बनने लगती है और यह सर्फ़ैक्टेंट नामक पदार्थ का उत्पादन शुरू करते हैं, जो जन्म के बाद सांस लेने में मदद करता है।
- पाचन तंत्र: शिशु थोड़ी मात्रा में अम्नियोटिक द्रव को निगलने और पचाने का अभ्यास करता है। इससे पाचन तंत्र का विकास शुरू हो जाता है।
6 महीने में बच्चे की मूवमेंट कैसी होती है?
गर्भावस्था के छठे महीने का सबसे रोमांचक पहलू यह है कि इस दौरान भ्रूण की हलचल ज़्यादा बार और ज़्यादा साफ़ महसूस होती है। अब तक, जो हलचल हल्की फड़फड़ाहट जैसी शुरू हुई थी (जिसे कभी-कभी “क्विकनिंग” (quickening) कहा जाता है) वह अब साफ़ किक, करवटें बदलने और हल्के झटकों में बदल गई है, जिन्हें आप असल में महसूस कर सकती हैं और कभी-कभी बाहर से देख भी सकती हैं।
आपका शिशु अब ज़्यादा देर तक जागता और सक्रिय रहता है, और उसकी हलचल का एक ऐसा पैटर्न बन गया है जिसे आप अब नोटिस करना शुरू कर सकती हैं। कुछ समय वह बहुत सक्रिय रहेगा और कुछ समय शांत रहेगा; ये दोनों ही बातें पूरी तरह से सामान्य हैं। ज़्यादातर हेल्थकेयर प्रोवाइडर 24वें हफ़्ते के आस-पास से “किक काउंट” (हलचल गिनने) करने का सुझाव देते हैं; इसमें आप यह ट्रैक करती हैं कि शिशु के सक्रिय रहने के दौरान आपको उसकी दस हलचलें महसूस होने में कितना समय लगता है।
यह जानना ज़रूरी है: अगर आपको शिशु की हलचल में अचानक या लंबे समय तक कोई कमी महसूस हो, तो तुरंत अपने हेल्थकेयर प्रोवाइडर से संपर्क करें। इंतज़ार करके चिंता करने से बेहतर हमेशा यही होता है कि आप एक बार जांच करवा लें।
इस चरण में शिशु आवाज़ों, रोशनी और स्पर्श पर प्रतिक्रिया भी दे सकता है। कई माँएँ यह नोटिस करती हैं कि कुछ खाने या कोई ठंडी चीज़ पीने के बाद, या फिर शाम के समय जब वे आराम करने के लिए लेटती हैं, तो उनका शिशु ज़्यादा सक्रिय हो जाता है।
6 महीने में कौन से टेस्ट ज़रूरी हैं?
छठे महीने में आमतौर पर कुछ ज़रूरी मेडिकल चेकअप और टेस्ट होते हैं। ये माँ और बच्चे, दोनों की सेहत पर नज़र रखने और किसी भी उभरती हुई समस्या का जल्दी पता लगाने के लिए किए जाते हैं। नीचे वे टेस्ट दिए गए हैं जो आपके डॉक्टर इस दौरान करवाने की सलाह दे सकते हैं:
- ग्लूकोज़ चैलेंज टेस्ट (GCT): जेस्टेशनल डायबिटीज़ की जाँच करता है; यह आमतौर पर 24–28 हफ़्तों के बीच किया जाता है।
- एनोमली अल्ट्रासाउंड / ग्रोथ स्कैन: बच्चे का आकार, उसकी स्थिति, अंगों का विकास और एम्नियोटिक फ़्लूइड के स्तर की जाँच करता है।
- कम्प्लीट ब्लड काउंट (CBC): एनीमिया और खून से जुड़ी अन्य समस्याओं की जाँच करता है।
- ब्लड प्रेशर की निगरानी: इस पूरे महीने प्री-एक्लेम्पसिया के लक्षणों पर नज़र रखना ज़रूरी है।
- यूरिन टेस्ट: प्रोटीन, ग्लूकोज़ और यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन के लक्षणों की जाँच करता है।
- आयरन और विटामिन D का स्तर: इस चरण में इनकी कमी होना आम बात है और इसके लिए सप्लीमेंट लेने की ज़रूरत पड़ सकती है।
इस दौरान अपने रूटीन अपॉइंटमेंट कभी न छोड़ें। भले ही आप खुद को ठीक महसूस कर रही हों, ये टेस्ट यह पक्का करने में मदद करते हैं कि आप और आपका बच्चा, दोनों ही सेहतमंद रहें।
स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती के लिए कुछ ज़रूरी सुझाव
आपके स्वास्थ्य पर अब दो ज़िंदगियां टिकी होती हैं। जितनी आप स्वस्थ रहेंगी, उतना ही आपका बच्चा तंदुरुस्त होगा। ज़ाहिर है कि आपकी सेहत का सीधा असर आपके शिशु के ऊपर पड़ता है। इसलिए, अपनी देखभाल को प्राथमिकता देना ज़रूरी है। नीचे स्वस्थ रहने के लिए कुछ ज़रूरी टिप्स दिए गए हैं:
पोषण
- आयरन: शिशु को रक्त आपूर्ति की ज़रूरत बढ़ जाती है, ऐसे में आपको ज़्यादा आयरन की ज़रूरत होती है। अपने आहार में पालक, मसूर और आयरन से भरपूर अनाज शामिल करें। साथ ही, ध्यान रखें कि आयरन की मात्रा बढ़ने पर आहार में विटामिन सी की मात्रा बढ़ा दें, ताकि आयरन आसानी से पच सके।
- कैल्शियम और विटामिन डी: ये पोषक तत्व शिशु की हड्डियों के विकास के लिए बेहद ज़रूरी हैं। अपने आहार में नियमित रूप से डेयरी प्रॉडक्ट और टोफ़ू को शामिल करें और कुछ समय धूप में ज़रूर गुज़ारें।
- ओमेगा-3 फ़ैटी एसिड: अखरोट, अलसी के बीज और मछली में पाए जाने वाले ये फ़ैट शिशु के मस्तिष्क और आंखों के विकास में मदद करते हैं।
- हाइड्रेशन: दिन में कम से कम 8–10 गिलास पानी पिएं, ताकि शरीर में पानी की कमी न हो।
व्यायाम
इस दौरान हल्की शारीरिक गतिविधियां भी ज़रूरी है। शरीर को फिट रखने और बाक़ी असुविधाओं को कम करने में इससे मदद मिलेगी:
- पैदल चलना: इससे ख़ून का प्रवाह बेहतर होता है और सूजन कम करने में भी यह काफ़ी मददगार साबित होता है।
- प्रीनेटल योग: शरीर में लचीलापन बढ़ाने, पोश्चर में सुधार करने और ध्यान लगाने के लिहाज़ से यह काफ़ी मददगार है।
- पेल्विक फ़्लोर व्यायाम: यह पेल्विक मांसपेशियों को मज़बूत बनाने में मदद करता है, जो डिलीवरी और उसके बाद की रिकवरी में सहायक साबित होता है।
6 महीने की प्रेग्नेंसी में सोने की सही पोज़िशन क्या है?
जैसे-जैसे आपका पेट बढ़ता है, सोना ज़्यादा मुश्किल होता जाता है, और प्रेग्नेंसी के छठे महीने में कई महिलाओं के लिए सोने की कोई आरामदायक पोज़िशन ढूँढ़ना एक बड़ी चिंता बन जाती है। सोने की सही पोज़िशन न सिर्फ़ आपके आराम के लिए, बल्कि बच्चे तक खून के बहाव के लिए भी बहुत मायने रखती है।
सोने की पोज़िशन के लिए गाइड — छठा महीना
- बाईं करवट लेकर सोने की सलाह दी जाती है: बच्चे और किडनी तक खून के बहाव के लिए सबसे अच्छी। लिवर पर पड़ने वाले दबाव को कम करती है।
- दाईं करवट लेकर सोना ठीक है: सुरक्षित और आरामदायक, हालाँकि ज़्यादातर डॉक्टर बाईं करवट सोने की ही सलाह देते हैं।
- पीठ के बल सोने से बचें: इससे ‘वेना कावा’ (vena cava) पर दबाव पड़ सकता है, जिससे खून का बहाव कम हो जाता है और चक्कर आ सकते हैं।
- पेट के बल सोना यह मुमकिन नहीं है: जैसे-जैसे आपका पेट बढ़ता है, इस तरह सोना अपने आप ही असहज हो जाता है।
कई डॉक्टर जिस पोज़िशन की सलाह देते हैं, उसे आम तौर पर “SOS” पोज़िशन कहा जाता है यानी करवट लेकर सोना, और हो सके तो बाईं करवट। बाईं करवट सोने से प्लेसेंटा तक खून का बहाव बेहतर होता है और आपकी किडनी शरीर से बेकार चीज़ों को ज़्यादा असरदार तरीके से बाहर निकालने में मदद करती है। अपने घुटनों के बीच एक तकिया और अपने पेट के नीचे एक और तकिया रखने से आपको ज़्यादा सहारा मिल सकता है, और पूरी रात आपको काफ़ी आराम महसूस होगा।
अगर आप जागने पर खुद को पीठ के बल लेटा हुआ पाएँ, तो घबराएँ नहीं। बस करवट लेकर दूसरी तरफ़ घूम जाएँ। सबसे ज़रूरी बात यह है कि आप लंबे समय तक लगातार पीठ के बल लेटे रहने की आदत न डालें।
गर्भावस्था के छठे महीने में होने वाली आम समस्याएं
हालांकि दूसरी तिमाही पहली और तीसरी तिमाही की तुलना में आमतौर पर आसान होती है, लेकिन गर्भावस्था के छठे महीने में समस्याएं आम हैं और दैनिक जीवन को प्रभावित कर सकती हैं। यहां कुछ ऐसी समस्याएं दी गई हैं जिनका सामना ज्यादातर महिलाएं करती हैं:
पीठ दर्द
बढ़ता हुआ गर्भाशय शरीर के गुरुत्वाकर्षण केंद्र को बदल देता है, जिससे पीठ के निचले हिस्से पर दबाव पड़ता है। हल्के स्ट्रेचिंग व्यायाम और आरामदायक जूते पहनने से आराम मिल सकता है।
सीने में जलन और एसिडिटी
गर्भाशय पेट पर दबाव डालता है, जिससे पाचन धीमा हो जाता है। थोड़ा-थोड़ा करके बार-बार भोजन करने से इस परेशानी को कम करने में मदद मिलती है।
पैरों में ऐंठन
रात में होने वाली ऐंठन आम है, जो अक्सर मैग्नीशियम या कैल्शियम की कमी से जुड़ी होती है। पर्याप्त मात्रा में पानी पीने और सोने से पहले पिंडली की हल्की स्ट्रेचिंग करने से आराम मिल सकता है।
सूजन (एडिमा)
पैरों और टखनों में हल्की सूजन सामान्य है। पैरों को ऊपर उठाने और लंबे समय तक खड़े रहने से बचने से इसे नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
सांस फूलना
गर्भाशय के ऊपर की ओर फैलने से डायाफ्राम पर दबाव पड़ सकता है। सीधे बैठने और भारी भोजन से बचने से यह समस्या कम हो सकती है।
ब्रेक्सटन हिक्स संकुचन
गर्भाशय का अनियमित, दर्द रहित संकुचन। ये अभ्यास संकुचन होते हैं और छठे महीने में पूरी तरह से सामान्य हैं।
चिकित्सकीय सहायता कब लें: यदि आपको अचानक या गंभीर सूजन, तीव्र सिरदर्द, दृष्टि में परिवर्तन, अत्यधिक रक्तस्राव या नियमित रूप से दर्दनाक संकुचन का अनुभव हो, तो तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करें।
छठे महीने के दौरान ध्यान रखने योग्य 5 ज़रूरी बातें
- संतुलित और आयरन से भरपूर खाना खाएं। इस महीने में एनीमिया (खून की कमी) सबसे आम समस्याओं में से एक है। अपने रोज़ के खाने में आयरन से भरपूर चीज़ें जैसे दालें, हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ और मेवे शामिल करें। इन्हें विटामिन C वाले स्रोतों के साथ खाएं ताकि आपका शरीर आयरन को ज़्यादा असरदार तरीके से सोख सके।
- शारीरिक रूप से सक्रिय रहें, लेकिन हल्के-फुल्के व्यायाम ही करें। हल्की सैर, प्रेग्नेंसी के दौरान किया जाने वाला योग (prenatal yoga) या तैराकी पीठ के दर्द को कम करने, नींद को बेहतर बनाने और आपकी मानसिक सेहत को ठीक रखने में मदद कर सकती है। ज़्यादा ज़ोर वाले काम या ऐसे व्यायाम करने से बचें जिनमें आपको लंबे समय तक अपनी पीठ के बल सीधा लेटना पड़े।
- अपने वज़न पर नज़र रखें। इस समय के दौरान वज़न का धीरे-धीरे और लगातार बढ़ना सामान्य बात है। आपके डॉक्टर या हेल्थकेयर प्रोवाइडर आपकी प्रेग्नेंसी से पहले के वज़न के आधार पर आपको सही वज़न सीमा के बारे में सलाह देंगे। “दो लोगों के लिए खाने” वाली सोच से बचें इसके बजाय, आप जो खा रही हैं उसकी गुणवत्ता पर ध्यान दें।
- शरीर में पानी की कमी न होने दें। दिन में कम से कम 8 से 10 गिलास पानी पीने का लक्ष्य रखें। शरीर में पानी की सही मात्रा होने से यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) का खतरा कम होता है, सूजन को नियंत्रित करने में मदद मिलती है और एम्नियोटिक द्रव का स्तर भी सही बना रहता है।
- अपनी मानसिक सेहत का भी ध्यान रखें। इस समय मूड में बदलाव, बच्चे के जन्म को लेकर चिंता और अपने शरीर के आकार को लेकर फिक्र होना आम बात है। अपने पार्टनर, प्रियजनों या किसी हेल्थकेयर प्रोफेशनल से खुलकर बात करने से आपको काफी राहत मिल सकती है। जब भी मौका मिले आराम करें और खुद के प्रति नरम रवैया अपनाएं।
डॉक्टर से कब संपर्क करें?
कुछ लक्षण बेहद सामान्य होते हैं, लेकिन अगर आपको नीचे दिए गए किसी लक्षण का पता चलता है, तो तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करें:
- पेट में तेज़ दर्द या ज़्यादा मात्रा में ब्लीडिंग
- सिर में लगातार तेज़ दर्द
- हाथ, पैर या चेहरे पर अचानक सूजन
- देखने में धुंधलापन या सांस लेने में तकलीफ़
- पेट के अंदर शिशु की गतिविधियों में कमी
हम आपका ख्याल रखते हैं
आत्मविश्वास के साथ अपने उपचार की शुरुआत करें


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इंश्योरेंस टीम का सपोर्ट
प्रेगनेंसी के छठे महीने में ये तैयारियां ज़रूरी हैं
प्रेगनेंसी का छठा महीना आने वाले दिनों के लिए प्लान करने के लिए अच्छा समय है। नीचे एक चेकलिस्ट दी गई है, जो आपको चीज़ों को व्यवस्थित रखने में मदद करेगी:
| काम | अहमियत |
| मैटरनिटी लीव प्लान करें | डिलीवरी के बाद आराम और रिकवरी के लिए यह ज़रूरी है |
| प्रीनेटल क्लास शुरू करें | डिलीवरी और शुरुआती दौर में शिशु की देखभाल के लिए शरीर को तैयार करने में मददगार है |
| बाल रोग विशेषज्ञ चुनें | आपके नवजात की देखभाल और नियमित सलाह के लिए यह प्लानिंग ज़रूरी है |
| बर्थ प्लान बनाएं | डॉक्टर से सलाह लेने के बाद देख लें कि कोई कॉम्प्लिकेशन (जटिलता) तो नहीं है। अगर है, तो उसी हिसाब से बर्थ प्लान करें |
| घर में ज़रूरी तैयारी करें | शिशु की ज़रूरतों के हिसाब से घर में तैयारी करें और एक सूची बना लें |
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या मैं छठे महीने में यात्रा कर सकती हूं?
हां, छठे महीने के दौरान यात्रा करना आमतौर पर सुरक्षित माना जाता है। हालांकि, लंबी यात्रा करने से पहले डॉक्टर की सलाह ज़रूर लें और यात्रा के दौरान बार-बार ब्रेक लेकर चलते-फिरते रहें।
इस महीने मुझे किन चीज़ों से बचना चाहिए?
कच्चे या अधपके सी-फ़ूड, बिना पॉश्चुराइज़ किया गया डेयरी प्रॉडक्ट और ज़्यादा कैफ़ीन के सेवन से बचें। ये आपके बच्चे के विकास के लिए जोखिम भरे हो सकते हैं।
मुझे अपने डॉक्टर से कितनी बार मिलना चाहिए?
ज़्यादातर डॉक्टर दूसरी तिमाही के दौरान महीने में एक बार चेक-अप कराने की सलाह देते हैं। हां, अगर कोई जटिलता आती है, तो उस समय डॉक्टर से संपर्क ज़रूर करें।
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