
IVF कैसे किया जाता है? प्रक्रिया, समय-सीमा और तैयारी के बारे में पूरी जानकारी

गर्भधारण करने में मुश्किलों का सामना कर रहे कई कपल्स के लिए, ‘इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन’ यानि IVF माता-पिता बनने का एक वास्तविक और कारगर तरीका है। यह इलाज शुरू में थोड़ा मुश्किल या उलझन भरा लग सकता है, खासकर इसमें इस्तेमाल होने वाली मेडिकल शब्दावली और कई चरणों की वजह से। अगर आपने कभी सोचा है कि IVF कैसे किया जाता है या इसके एक चक्र (साइकिल) के दौरान असल में क्या होता है, तो यह लेख आपके लिए हैं।
हमें क्यों चुनें?

IVF क्या है और यह कैसे किया जाता है?
IVF एक सहायक प्रजनन तकनीक (असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी – ART) है, जिसमें शरीर के बाहर एक प्रयोगशाला (लैब) की डिश में अंडे और स्पर्म को मिलाकर भ्रूण (embryo) बनाया जाता है। जब फर्टिलाइज़ेशन हो जाता है और भ्रूण कुछ दिनों तक विकसित हो जाता है, तो उसे महिला के गर्भाशय (uterus) में ट्रांसफर कर दिया जाता है, जहाँ वह इम्प्लांट होकर गर्भावस्था में बदल सकता है।
आसान शब्दों में कहें तो, यह प्रक्रिया शरीर के बाहर गर्भधारण की प्रक्रिया को दोहराती है और फिर बने हुए भ्रूण को सही जगह पर स्थापित करती है। इसमें ओवरी (अंडाशय) को स्टिमुलेट करना, अंडे निकालना, लैब में स्पर्म के साथ उन्हें फर्टिलाइज़ करना, बने हुए भ्रूणों को विकसित करना और सबसे स्वस्थ भ्रूण को गर्भाशय में ट्रांसफर करना शामिल है। हर चरण की बारीकी से निगरानी ब्लड टेस्ट और अल्ट्रासाउंड के ज़रिए की जाती है।
किन स्थितियों में IVF एक बेहतर विकल्प है?
IVF हमेशा इलाज का पहला तरीका नहीं होता है, लेकिन इन स्थितियों में इसे प्राथमिकता दी जाती है:
- फैलोपियन ट्यूब का बंद होना: जब ट्यूब बंद या खराब हो जाती हैं, तो स्पर्म प्राकृतिक रूप से अंडे तक नहीं पहुँच पाते। IVF शरीर के बाहर अंडे को फर्टिलाइज़ करके इस रुकावट को दूर करता है।
- पुरुषों में इंफर्टिलिटी: स्पर्म की कम संख्या, खराब गतिशीलता (motility) या असामान्य आकार के कारण प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करना मुश्किल हो जाता है। IVF, जिसे अक्सर ICSI (एक स्पर्म को सीधे अंडे में इंजेक्ट करना) के साथ किया जाता है, फर्टिलाइज़ेशन की संभावना को बढ़ाता है।
- ओव्यूलेशन से जुड़ी समस्याएं: PCOS या अनियमित ओव्यूलेशन जैसी स्थितियों के कारण प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करना मुश्किल हो सकता है। IVF डॉक्टरों को अंडे के विकास को बारीकी से नियंत्रित और मॉनिटर करने की सुविधा देता है।
- बढ़ती उम्र में गर्भधारण: उम्र बढ़ने के साथ महिलाओं में अंडे की गुणवत्ता और संख्या कम हो जाती है। IVF, कभी-कभी अतिरिक्त तकनीकों के साथ मिलकर, सफल गर्भावस्था की संभावनाओं को बेहतर बना सकता है।
- अस्पष्ट कारण से इंफर्टिलिटी: जब पूरी जांच के बाद भी कोई स्पष्ट कारण नहीं मिलता है, तो आसान इलाज के काम न करने पर अक्सर IVF की सलाह दी जाती है।
- जेनेटिक विकार: जिन कपल्स में जेनेटिक बीमारियाँ बच्चों में जाने का जोखिम होता है, वे उस जोखिम को कम करने के लिए IVF के साथ भ्रूण की जेनेटिक स्क्रीनिंग करवा सकते हैं।
IVF की स्टेप-बाय-स्टेप प्रक्रिया
हर IVF साइकल में स्टेप्स का एक तय क्रम होता है, हालांकि हर व्यक्ति की ज़रूरतों के हिसाब से सही तरीका बदला जा सकता है।
- ओवेरियन स्टिमुलेशन: हार्मोन के इंजेक्शन ओवरी को कई मैच्योर अंडे बनाने के लिए स्टिमुलेट करते हैं, जबकि नैचुरल साइकल में सिर्फ़ एक अंडा निकलता है। यह फ़ेज़ आमतौर पर 10 से 14 दिन तक चलता है और रेगुलर ब्लड टेस्ट और अल्ट्रासाउंड से इसकी निगरानी की जाती है।
- ट्रिगर शॉट: जब फ़ॉलिकल्स सही साइज़ के हो जाते हैं, तो एक ट्रिगर इंजेक्शन अंडों को पूरी तरह मैच्योर होने में मदद करता है; यह इंजेक्शन अंडे निकालने (retrieval) से ठीक पहले दिया जाता है।
- एग रिट्रीवल: बेहोशी की दवा (sedation) देकर एक छोटी सी प्रक्रिया के ज़रिए मैच्योर अंडे निकाले जाते हैं। इसके लिए अल्ट्रासाउंड की मदद से एक बारीक सुई का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें आमतौर पर 15 से 20 मिनट लगते हैं।
- स्पर्म कलेक्शन: उसी दिन पुरुष पार्टनर से स्पर्म का सैंपल लिया जाता है, या अगर फ़्रोज़न स्पर्म का इस्तेमाल हो रहा है, तो उसे अनफ्रोजन (thaw किया) जाता है।
- फ़र्टिलाइज़ेशन: लैब में अंडों और स्पर्म को मिलाया जाता है। यह पारंपरिक इनसेमिनेशन या ICSI के ज़रिए किया जा सकता है, जिसमें एक स्पर्म को सीधे हर मैच्योर अंडे में इंजेक्ट किया जाता है।
- एम्ब्रियो कल्चर: फ़र्टिलाइज़्ड अंडों को तीन से छह दिनों तक कल्चर किया जाता है, जिससे एम्ब्रियोलॉजिस्ट उनके विकास पर नज़र रख सकें और सबसे हेल्दी एम्ब्रियो चुन सकें।
- एम्ब्रियो ट्रांसफ़र: एक पतले कैथेटर का इस्तेमाल करके एक या ज़्यादा एम्ब्रियो को गर्भाशय (uterus) में रखा जाता है। यह एक तेज़ और आम तौर पर दर्द-रहित प्रक्रिया है जिसके लिए एनेस्थीसिया की ज़रूरत नहीं होती।
- ल्यूटियल फ़ेज़ सपोर्ट और प्रेग्नेंसी टेस्ट: प्रोजेस्टेरोन सप्लीमेंट्स गर्भाशय की परत (uterine lining) को सपोर्ट करते हैं। ट्रांसफ़र के लगभग दो हफ़्ते बाद, ब्लड टेस्ट से यह पता चलता है कि साइकल से प्रेग्नेंसी हुई है या नहीं।
IVF ट्रीटमेंट की टाइमलाइन
एक IVF साइकल शुरू होने से खत्म होने तक लगभग चार से छह हफ़्ते का समय लेती है:
- पहला हफ़्ता: शुरुआती सलाह-मशविरा, फर्टिलिटी टेस्ट और ट्रीटमेंट की योजना बनाना।
- पहला-दूसरा हफ़्ता: रोज़ाना इंजेक्शन और मॉनिटरिंग विज़िट के ज़रिए ओवेरियन स्टिमुलेशन (अंडे बनाने की प्रक्रिया)।
- 12-14वां दिन (लगभग): ट्रिगर शॉट और उसके बाद अंडे निकालना (egg retrieval)।
- अंडे निकालने के बाद 1-6 दिन: लैब में फर्टिलाइज़ेशन और एम्ब्रियो कल्चर।
- अंडे निकालने के बाद तीसरा या पांचवां दिन: एम्ब्रियो ट्रांसफर (फ्रेश साइकल) या बाद में फ्रोज़न ट्रांसफर के लिए एम्ब्रियो को फ्रीज़ करना।
- ट्रांसफर के दो हफ़्ते बाद: ब्लड रिपोर्ट के ज़रिए प्रेग्नेंसी टेस्ट।
कुछ कपल्स फ्रेश एम्ब्रियो ट्रांसफर के बजाय फ्रोज़न एम्ब्रियो ट्रांसफर करवाते हैं, जिसमें कल्चर के बाद एम्ब्रियो को फ्रीज़ कर दिया जाता है और गर्भाशय की परत (uterine lining) के सही ढंग से तैयार होने पर बाद की साइकल में ट्रांसफर किया जाता है। इसमें कुछ अतिरिक्त हफ़्ते लगते हैं, लेकिन सफलता की संभावना कम नहीं होती है।
IVF की सफलता की दर पर कौन-सी बातें असर डालती हैं?
IVF के नतीजे अलग-अलग हो सकते हैं और कई बातें इसमें भूमिका निभाती हैं:
- महिला की उम्र: उम्र बढ़ने के साथ अंडे की क्वालिटी और संख्या कम हो जाती है, इसलिए 35 साल से कम उम्र में सफलता की दर सबसे ज़्यादा होती है और उसके बाद धीरे-धीरे कम होती जाती है।
- इंफर्टिलिटी का कारण और समय: असल वजह और कपल कितने समय से कोशिश कर रहा है, इसका असर नतीजों पर पड़ सकता है।
- ओवेरियन रिज़र्व: AMH लेवल और एंट्रल फॉलिकल काउंट जैसे टेस्ट यह अंदाज़ा लगाने में मदद करते हैं कि ओवरी स्टिमुलेशन पर कितनी अच्छी तरह प्रतिक्रिया देती हैं।
- स्पर्म की क्वालिटी: स्पर्म काउंट, मोटिलिटी और मॉर्फोलॉजी सीधे फर्टिलाइज़ेशन की दर पर असर डालते हैं।
- एम्ब्रियो की क्वालिटी: अच्छी क्वालिटी वाले एम्ब्रियो के इम्प्लांट होने की संभावना ज़्यादा होती है।
- गर्भाशय की सेहत: फाइब्रॉएड, पॉलीप्स या गर्भाशय की पतली लाइनिंग इम्प्लांटेशन पर असर डाल सकती है।
- लाइफस्टाइल से जुड़ी बातें: स्मोकिंग, ज़्यादा शराब पीना, मोटापा और ज़्यादा तनाव सफलता की दर को कम कर सकते हैं।
- पहले की IVF कोशिशें: पिछले साइकल का रिकॉर्ड डॉक्टरों को प्रोटोकॉल में ज़रूरी बदलाव करने में मदद करता है।
- लैबोरेटरी के स्टैंडर्ड और विशेषज्ञता: एम्ब्रियोलॉजी लैब की क्वालिटी और मेडिकल टीम का अनुभव एक बड़ा और मापने लायक फ़र्क पैदा करते हैं।
सही डॉक्टर और IVF क्लिनिक कैसे चुनें?
सही स्पेशलिस्ट और क्लिनिक चुनना आपकी IVF यात्रा के सबसे अहम फैसलों में से एक है:
- योग्यता और अनुभव: ऐसे रिप्रोडक्टिव एंडोक्रिनोलॉजिस्ट या फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट को चुनें जिन्हें आपके जैसे मामलों को संभालने का अनुभव हो।
- सफलता की दर: क्लिनिक से सफलता की दर के बारे में पूछें, और बेहतर होगा कि यह जानकारी उम्र के हिसाब से अलग-अलग हो, ताकि आप सही तुलना कर सकें।
- लैबोरेटरी इंफ्रास्ट्रक्चर: अच्छी सुविधाओं वाली एम्ब्रियोलॉजी लैब, जिसमें एडवांस्ड टेक्नोलॉजी (जैसे टाइम-लैप्स इनक्यूबेटर) हो, बेहतर नतीजे दे सकती है।
- खर्च में पारदर्शिता: एक भरोसेमंद क्लिनिक शुरू में ही खर्च का साफ ब्योरा देता है, जिसमें बाद में कोई छिपा हुआ खर्च नहीं जोड़ा जाता।
- पर्सनलाइज़्ड देखभाल: IVF हर किसी के लिए एक जैसा नहीं होता; इलाज का तरीका किसी स्टैंडर्ड टेम्पलेट के बजाय आपकी खास बीमारी या स्थिति के हिसाब से तय किया जाना चाहिए।
- भावनात्मक सहारा: फर्टिलिटी का इलाज मुश्किल हो सकता है, इसलिए काउंसलिंग और मददगार केयर टीम का होना उतना ही ज़रूरी है जितना कि क्लिनिकल जानकारी और अनुभव।
- कपल्स के रिव्यू: इलाज के अनुभव के बारे में असली मरीज़ों की राय से उपयोगी जानकारी मिल सकती है।
IVF ट्रीटमेंट के लिए Birla Fertility & IVF को क्यों चुनें?
Birla Fertility & IVF ने 2,5 0,000 से ज़्यादा कपल्स को माता-पिता बनने के सफ़र में मदद की है। इसके लिए उनके क्लीनिक नेटवर्क में 120 से ज़्यादा फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट की टीम काम करती है। हर ट्रीटमेंट प्लान मरीज़ की बीमारी की पहचान, उम्र और मेडिकल हिस्ट्री के आधार पर खास तौर पर तैयार किया जाता है, न कि किसी आम तरीके से।
क्लीनिक में एडवांस्ड एम्ब्रियोलॉजी लैब और मॉडर्न टेक्नोलॉजी मौजूद है, जिसका मकसद एम्ब्रियो चुनने और नतीजों को बेहतर बनाना है। अब तक यहाँ 1,40,000 से ज़्यादा IVF साइकल किए जा चुके हैं। फिक्स्ड-प्राइस पैकेज और 0% EMI ऑप्शन के ज़रिए ट्रीटमेंट को आर्थिक रूप से आसान बनाया गया है। साथ ही, पहली सलाह से लेकर एम्ब्रियो ट्रांसफर के बाद के फ़ॉलो-अप तक एक डेडिकेटेड केयर टीम मदद करती है।
भारत में IVF का खर्च कितना है?
भारत में एक IVF साइकल का खर्च आम तौर पर लगभग ₹1,00,000 से ₹2,50,000 के बीच होता है, जो शहर, क्लीनिक और अपनाए गए तरीके के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है। ICSI, डोनर एग या स्पर्म, एम्ब्रियो की जेनेटिक टेस्टिंग (PGT) या फ्रोज़न एम्ब्रियो ट्रांसफर जैसी अतिरिक्त प्रक्रियाओं से कुल खर्च बढ़ जाता है।
सबसे सस्ता ऑप्शन हमेशा सबसे अच्छा नहीं होता। सफलता की दर, लैब की क्वालिटी और मेडिकल टीम का अनुभव भी कीमत जितनी ही अहमियत रखते हैं। कई क्लीनिक आर्थिक बोझ कम करने के लिए किस्तों या EMI का ऑप्शन भी देते हैं।
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इंश्योरेंस टीम का सपोर्ट
निष्कर्ष
IVF ने लाखों कपल्स को वह परिवार बनाने का मौका दिया है जिसकी उन्हें उम्मीद थी। इस प्रोसेस में कई चरण होते हैं और धैर्य की ज़रूरत होती है, लेकिन यह समझने से कि IVF कैसे किया जाता है, यह सफ़र कम मुश्किल लग सकता है। अगर आप IVF के बारे में सोच रहे हैं, तो किसी क्वालिफ़ाइड फ़र्टिलिटी स्पेशलिस्ट से सलाह लें, प्रोसेस और खर्चों के बारे में विस्तार से सवाल पूछें, और ऐसी क्लिनिक चुनें जो क्लिनिकल विशेषज्ञता और सही सपोर्ट, दोनों देती हो।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
क्या IVF की प्रक्रिया बहुत दर्दनाक होती है?
IVF के ज़्यादातर हिस्सों में, जैसे हार्मोनल इंजेक्शन, बस थोड़ी बेचैनी होती है। एग निकालने की प्रक्रिया बेहोशी की दवा (sedation) देकर की जाती है, इसलिए मरीज़ों को प्रक्रिया के दौरान कोई दर्द महसूस नहीं होता, हालांकि बाद में पेट में ऐंठन या पेट फूलना आम बात है और यह कुछ समय के लिए ही होता है।
एक IVF साइकल में कितना समय लगता है?
एक आम फ्रेश साइकल में ओवेरियन स्टिमुलेशन शुरू होने से लेकर प्रेग्नेंसी टेस्ट तक लगभग चार से छह हफ़्ते लगते हैं। फ्रोज़न एम्ब्रियो ट्रांसफर साइकल में कुछ हफ़्ते ज़्यादा लग सकते हैं।
पहली बार में IVF के सफल होने की कितनी संभावना होती है?
पहली बार में सफलता की संभावना उम्र, इंफर्टिलिटी के कारण और दूसरे कारकों के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। कई मरीज़ पहली साइकल में ही गर्भवती हो जाती हैं, जबकि कुछ को एक से ज़्यादा बार कोशिश करनी पड़ती है।
क्या IVF से पैदा होने वाले बच्चे स्वस्थ होते हैं?
रिसर्च से लगातार यह पता चलता है कि IVF से गर्भधारण करने वाले बच्चे, कुल मिलाकर, प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करने वाले बच्चों जितने ही स्वस्थ होते हैं। किसी भी प्रेग्नेंसी की तरह ही इसमें भी नियमित प्रसव-पूर्व देखभाल (prenatal care) और निगरानी की सलाह दी जाती है।
क्या IVF प्रेग्नेंसी प्राकृतिक प्रेग्नेंसी जैसी ही होती है?
एक बार इम्प्लांटेशन हो जाने के बाद, IVF प्रेग्नेंसी प्राकृतिक प्रेग्नेंसी की तरह ही आगे बढ़ती है, जिसमें वही तिमाही (trimesters) और प्रसव-पूर्व देखभाल शामिल होती है। एकमात्र अंतर यह है कि गर्भधारण कैसे हुआ।
IVF करवाने के लिए सबसे अच्छी उम्र कौन सी है?
सफलता की दर आम तौर पर तब सबसे ज़्यादा होती है जब महिलाओं की उम्र 35 साल से कम हो, क्योंकि कम उम्र में एग की क्वालिटी और ओवेरियन रिज़र्व बेहतर होते हैं। फिर भी, व्यक्तिगत स्वास्थ्य कारकों के आधार पर, ज़्यादा उम्र में भी IVF सफल हो सकता है।
भारत में महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर के बढ़ते मामलों का मुख्य कारण क्या है?
बढ़ते मामलों का संबंध मुख्य रूप से ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV) के कुछ खास स्ट्रेन के लगातार संक्रमण से है, साथ ही नियमित स्क्रीनिंग के बारे में कम जानकारी और HPV वैक्सीन का कम इस्तेमाल भी इसके कारण हैं। स्क्रीनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण देर से पता चलने से भी मामलों की संख्या बढ़ती है।
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